यहां मछलियों के मरने पर किया जाता है उनका ‘अंतिम संस्कार’, जानें ये रोचक बात

यदि ये कहा जाए कि बिहार आस्था और मंदिरों का केंद्र है तो इसमें जरा भी अतिश्योक्ति नहीं होगी. आपने इस प्रदेश के बारे में बहुत कुछ सुना होगा लेकिन हम आज आपको नालंदा जिले के पावापुरी की एक अद्भुत जानकारी देने जा रहे हैं. जी हां… यहां 84 बीघे का तालाब आस्था और श्रद्धा का अद्भुत नमूना है.

आपको बता दें कि जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की निर्वाण भूमि पावापुरी जैन धर्मावलंबियों का आस्था का केंद्र है. यहां का जल मंदिर सभी को आकर्षित करता है जिसके चारों ओर करीब 84 बीघे में तालाब है. करीब 500 वर्ष ईसा पूर्व जब भगवान महावीर का यहां दाह संस्कार हुआ तो उनकी चिता की राख एकत्र करने के लिए बड़ी संख्या में अनुयायी यहां पहुंचे. इससे धीरे-धीरे उनकी चिता के चारों ओर बड़ा सा तालाब बन गया और आज इसी तालाब के बीच में जलमंदिर आपको नजर आएगा.

इस तालाब की खास बात यह है कि यहां की मछलियों का शिकार नहीं किया जाता. यह जानकर शायद आपको आश्चर्य होगा कि मछलियों की प्राकृतिक मौत के बाद यदि मंदिर प्रबंधन की उन पर नजर जाती है तो उनका ‘अंतिम संस्कार’ किया जाता है. योरहेरिटेज डॉट इन से बात करते हुए पावापुरी स्थित जैन श्वेतांबर मंदिर के प्रबंधक गीतम मिश्र ने बताया, ‘ऐसी मछलियां मिलने पर हम जमीन खोदकर उसमें पहले नमक डालते हैं और फिर उस पर मरी मछलियां डालकर उसे कपड़े से ढंक दिया जाता है. बाद में गड्ढे को फिर से मिट्टी से भर दिया जाता है.

गीतम मिश्र आगे कहते हैं कि ऐसा जैन धर्म की इस मान्यता के अनुसार किया जाता है. मान्यता है कि मछली भी इंसान की तरह ही एक जीव है और उसकी आत्मा की शांति के लिए ऐसा किया जाता है.

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