112 वर्षों से शांति का प्रतीक, जानें टैगोर हिल के ब्रह्म मंदिर की खास बातें

झारखंड की राजधानी रांची में टैगोर हिल है जो लोगों के लिए पर्यटन स्थल से कम नहीं. रोज सैकड़ों लोग यहां घूमने के लिए आते हैं. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और उनके भाई ज्योतिरिंद्र नाथ टैगोर की यादें मोरहाबादी के टैगोर हिल से जुड़ी हुई हैं. टैगोर हिल के शीर्ष पर स्थित ब्रह्म मंदिर की नींव 14 जुलाई 1910 में रखी गयी थी.

प्राकृतिक सौंदर्य व आदित संस्कृति संरक्षण संस्थान (एसपीटीएन) के अध्यक्ष अजय कुमार जैन ने प्रभात खबर अखबार से बातचीत के क्रम में बताया कि ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर 1884 में पत्नी के निधन के बाद वैरागी हो गये थे. इसके बाद 1902 से 1908 तक परिवार में कई लोगों की अकाल मृत्यु हो गयी. इससे आहत होकर 1908 में ज्योतिरिंद्र नाथ टैगोर बड़े भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर के साथ रांची पहुंचे. यहां का परिवेश भा गया और उन्होंने यही रहने का मन बना लिया. 23 अक्तूबर 1908 को ही मोरहाबादी पहाड़ी गांव के जमींदार बाबू हरिहर सिंह से मिलकर 15 एकड़ 80 डिसमिल जमीन पहाड़ी के साथ बंदोबस्त करायी. फिर 1910 में ब्रह्म मंदिर का निर्माण शुरू हुआ. ब्रह्म मंदिर के साथ-साथ पहाड़ी के परिसर में शांतिधाम का भी निर्माण किया गया़ ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर यहीं रहने लगे. इसका जिक्र 1910 में बांग्ला पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ में भी मिलता है.

इस स्थान को जानने वाले बताते हैं कि डॉ सरोज बोस, मंजरी चक्रवर्ती और कृष्णा प्रसाद से प्राप्त तथ्यों के आधार पर ब्रह्म मंदिर की नींव रखे जाने के बाद परिसर में संगीत, गोष्ठी, भजन, प्रवचन और कीर्तन होने लगे. परिसर में रहते हुए ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर ने 1924 में बाल गंगाधर तिलक की मराठी पुस्तक ‘गीता रहस्य’ का बांग्ला अनुवाद किया था. और चार मार्च 1925 में शांति धाम परिसर में अंतिम सांस ली.