26 जनवरी को हिंसा, मोदी कैबिनेट में बड़ा बदलाव, ये हैं साल 2021 के बड़े राजनीतिक घटनाक्रम

बीते एक साल के दौरान कई घटनाओं ने न केवल बड़े स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा, बल्कि उसका आमजन के जीवन पर भी बड़ा असर पड़ा. कोरोनावायरस की दूसरी घातक लहर से लेकर इस दौर में कई महीनों तक चले किसानों के प्रदर्शन, विधानसभा चुनाव के दौरान हिंसा, आर्थिक चुनौतियों और बाद के महीनों में ओलिंपिक आयोजन ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया. प्रधानमंत्री द्वारा विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा, पेगासस जासूसी आरोप जैसी घटनाएं चर्चाओं के केंद्र में रहीं. कुछ ऐसी ही राजनीतिक घटनाओं पर डालते हैं एक नजर…

किसान आंदोलन और 26 जनवरी को हुई हिंसा : केंद्र सरकार द्वारा बनाये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर किसानों ने बड़े स्तर पर आंदोलन चलाया. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से आये किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर एक साल तक डेरा डाले रखा. साल की शुरुआत में संयुक्त किसान मोर्चे ने दिल्ली में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड निकालने की घोषणा की थी. गणतंत्र दिवस के दिन किसानों का एक समूह प्रतिबंधित मार्ग से होते हुए लाल किले पर पहुंच गया. इस दौरान किसानों का प्रदर्शन हिंसक हो गया और पुलिस के साथ झड़प भी हुई. उपद्रवियों ने सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया. प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने लाल किले पर तिरंगे को हटाकर वहां निशान साहिब लगा दिया. किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प में कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए. इस घटना के बाद किसानों के इस आंदोलन की दिशा बदल गयी. साल के आखिर में प्रधानमंत्री द्वारा कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के साथ ही आंदोलन खत्म हो गया.

जम्मू-कश्मीर के नेताओं की प्रधानमंत्री से मुलाकात : जनवरी महीने में जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. इस दौरान ‘अपनी पार्टी’ के प्रमुख अल्ताफ बुखारी ने कहा प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि नवगठित केंद्र शासित प्रदेश की परिसीमिन पूरा होते ही चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी जायेगी. जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने दोबारा पूर्ण राज्य की व्यवस्था को बहाल करने की मांग की. जम्मू-कश्मीर से 5 अगस्त, 2019 को धारा-370 की समाप्ति की घोषणा के बाद केंद्र और कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बीच यह पहली उच्च स्तर की वार्ता थी. इस बैठक में कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद, तारा चंद और जीए मीर, नेशनल कांफ्रेंस के फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, पीडीपी से महबूबा मुफ्ती, जे-के अपनी पार्टी के अल्ताफ बुखारी, भाजपा के रविंदर रैना, निर्मल सिंह, कविंदर गुप्ता, सीपीआई (एम) के एमवाई तारीगामी, नेशनल पैंथर्स पार्टी के प्रोफेसर भीम सिंह और पीपुल कांफ्रेंस के सज्जाद गनी लोन शामिल हुए. इसके अलावा गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी बैठक में मौजूद रहे.

मोदी कैबिनेट में बड़ा बदलाव : मई, 2019 में दूसरी बार सत्ता में वापसी के बाद प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पहली बार कैबिनेट में बदलाव किया गया. इससे पहले मोदी और भाजपा के शीर्ष नेताओं की बैठकों का लंबा सिलसिला चला. कोविड संकट से निपटने को लेकर हुई आलोचना के मद्देनजर सरकार द्वारा यह फैसला किया गया. नये मंत्रियों में सर्बानंद सोनोवाल, नारायण राणे और ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि नेताओं की एंट्री हुई, तो वहीं स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, आइटी एवं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जैसे बड़े चेहरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. बदलाव के तहत 15 कैबिनेट मंत्रियों और 28 राज्य मंत्रियों ने शपथ ली. साथ ही सात नयी महिला मंत्रियों की भी एंट्री हुई. मोदी कैबिनेट में महिला मंत्रियों में निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी, दर्शना जार्दोश, प्रतिमा भौमिक, शोभना कारंदलाजे, डॉ भारती प्रवीण पंवार, मीनाक्षी लेखी, अनुप्रिया पटेल और अन्नपूर्णा देवी शामिल हैं.

पंजाब में राजनीतिक संकट : पंजाब में राजनीतिक उठा-पटक के बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. अगले वर्ष होनेवाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के नेताओं के बीच जारी मतभेद और तनातनी के चलते उन्होंने 18 सितंबर को अपना इस्तीफा आलाकमान को भेज दिया. उन्होंने कहा कि वे पार्टी में अपमानित महसूस कर रहे थे और इस बात की जानकारी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को दे दी है. इसके बाद चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मुख्यमंत्री बने. वे पंजाब के इतिहास में इस पद पर पहुंचनेवाले पहले दलित नेता हैं. खींचतान और गतिरोध कम नहीं हुआ. इसके अहम किरदार नवजोत सिंह सिद्धू ने 28 सितंबर को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे दिया. हालांकि, राहुल गांधी के साथ बैठक के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया.

कई राज्यों में बदले गये मुख्यमंत्री : साल 2022 में होनेवाले विधानसभा चुनावों से पहले इस वर्ष उत्तराखंड में तीन मुख्यमंत्री बदले गये. त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बनाये गये. लेकिन, चार महीने के छोटे से कार्यकाल के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया, इसके बाद पुष्कर सिंह धामी राज्य के नये मुख्यमंत्री बने. कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद 28 जुलाई को बासवराज बोम्मई ने कर्नाटक के नये मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. उनके पिता और जनता परिवार के दिग्गज रहे एसआर बोम्मई भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. गुजरात में विजय रुपाणी के स्थान पर पहली बार एमएलए बने भूपेंद्र पटेल ने 13 सितंबर को 17वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. साल 2001 में राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद से वे भाजपा के चौथे मुख्यमंत्री हैं.

राज्यसभा के 12 सांसदों का निलंबन : अगस्त महीने में मॉनसून सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही में व्यवधान डालने के आरोप में शीतकालीन सत्र के दौरान 12 सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया. निलंबित किये गये सांसदों में कांग्रेस के सैयद नसीर हुसैन, अखिलेश प्रताप सिंह, फुलो देवी नेताम, छाया वर्मा, रिपुन वोरा और राजमणि पटेल, शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी, अनिल देसाई, सीपीआई-एम के इलामाराम करीम, सीपीआई के बिनॉय विस्वम और तृणमूल कांग्रेस के डोला सेन तथा शांता छेत्री शामिल रहे. राज्यसभा के सभापति ने सदस्यों के व्यवहार पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सदस्यों को लोकतांत्रिक और संसदीय मर्यादा के अनुरूप बर्ताव करना चाहिए.
साभार: प्रभात खबर